
ये और बात है तुम्हे मुझ पर यकी नहीं
जब भी मिला मुझसे सीधे गले मिला
पीठ पर ये खंजर उसी का तो कही नहीं
शब भर चला दौर जहन्नुम-ओ-बहिश्त में
मैं वहाँ भी नहीं था मैँ यहाँ भी नहीं
दीवानगी को मेरे तुम न समझ पाओगे
दानिश की किताब में हर्फ-ए-इश्क ही नहीँ
दयरोहरम में खोजा “काफिर” तमाम उम्र
मैकदे मे जो मिला वही तो कही नहीं
भाई उर्दू के शब्दो का अर्थ भी दे दिया करो साथ में काफ़िरो की बात आसानी से उतरती नही
जवाब देंहटाएंबहुत खूब...काबिले तारीफ लिखा है.
जवाब देंहटाएंबहुत खूब संजय भाई..........मज़ा आ गया पढ़ कर......
जवाब देंहटाएंआपकी सोहबत में थोडा सीख लेंगे हैं.....
वर्ना ये सच है हमको आती आशिकी नहीं....