जिनके दम से रोशनाई है...........
जिनसे बरसों की शनाशाई है......
जिनकी खातिर सुखनवराई है....
जिनकी सौगात ये तन्हाई है .....

संजय महापात्र "काफिर"

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011



मेरी दास्तां को रूबाई बना दो
गज़ल गुनागुनाने का शमां तुम बना दो

पुराने जख्म कुछ भर से गये हैं
इनमें जरा तुम नश्तर लगा दो

हुए खत्म इंम्तिहाँ गर जुल्मों सितम के
कभी आ कर नतीजा-ए-मोहब्बत सुना दो

गुजरे जमाने बेघर हुए अब
खातिर बसर आशियाँ तो बना दो

बहुत थक गये दौड़-ए-दुनिया से "काफिर"
मिले चैन रूह को इक नगमा सुना दो


............. संजय महापात्र"काफिर"...........

1 टिप्पणी:

  1. बहुत थक गये दौड़-ए-दुनिया से "काफिर"
    मिले चैन रूह को इक नगमा सुना दो

    लाजवाब!
    --------
    कल 08/08/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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